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अडानी अम्बानी का विरोध : उद्योगपतियों के गुलामी का इतिहास आपकी आंखे खोल देगा !

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अडानी अम्बानी का विरोध

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अडानी अम्बानी का विरोध : उद्योगपतियों के गुलामी का इतिहास आपकी आंखे खोल देगा !

20214 में मोदी सरकार बनने के बाद से अडानी अम्बानी का विरोध फैशन बन गया. कांग्रेस पार्टी और मोदी विरोधियों ने इन दोनों उद्योगपतियों की छवि ऐसी बना दी है मानो सबसे बड़े लुटुरे यही हों. हाल ही में किसान आंदोलन के दौरान तथाकथित किसान नेताओं ने मीडिया के सामने अडानी अम्बानी के बायकाट का ऐलान किया गया. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी हमेशा मोदी को घेरने के लिए इन दोनों के नाम का उपयोग करते है. इसमें कोई शक नहीं की कोई भी उद्योगपति समाजसेवा नहीं करता. व्यापारी हमेशा अपना फायदा या नुकसान देखकर ही कोई कदम उठाता है. कह सकते है की कोई भी उद्योगपति दूध का धुला नहीं होता. अडानी अम्बानी के बारे में तो आपने बहुत सुना है लेकिन क्या आप जानते है बिरला और बजाज ने दशकों तक देश पर राज़ किया है.

अडानी अम्बानी का विरोध
अडानी अम्बानी का विरोध

बजाज ग्रुप के मालिक राहुल बजाज को अक्सर आपने देखा होगा मोदी सरकार की आलोचना करते हुए. लेकिन शायद आप ये नहीं जानते होंगे कांग्रेस की बदौलत बजाज ग्रुप दुपहिया वाहन के क्षेत्र में दशकों तक एकक्षत्र राज़ किया है. बिड़ला और बजाज ने कांग्रेस से आजादी के संघर्ष के दौरान कांग्रेस पार्टी को दिए आर्थक सहयोग की मोटी कीमत कुछ क्षेत्रों में कई दशकों तक एकाधिकार के रूप में उद्योग स्थापित करने और व्यापार करने की सुविधा प्राप्त कर वसूली। आजादी के बाद केन्द्र समेत देश की सभी राज्य सरकारों द्वारा केवल एम्बेसेडर कार ही खरीदी जाती रही. उस दौर में अन्य किसी भी कार की सरकारी खरीद की अनुमति नहीं थी. उस दौर में मुंबई के अलावा पुरे देश में सिर्फ और सिर्फ एम्बेस्डर कार को टैक्सी का परमिट मिलता

कांग्रेस की मेहरबानी से अम्बेस्डर ने भारतीय बाजार पर लगभग 40 सालो तक हुकूमत चलाई. एम्बेस्डर कार को उद्योगपति बिरला ग्रुप बनाती थी. 10 – 15 साल पहले तक देश के अधिकतर राज्यों में कांग्रेस या उसके समर्थन की सरकारें हुआ करती थी. उद्योगपति बिरला कांग्रेस पार्टी को मोती रकम चंदे के रूप में देते थे बदले में उन्हें भरपूर सहयोग मिलता था. सरकारी अधिकारीयों से लेकर प्रधानमंत्री तक अम्बेस्डर का इस्तेमाल करते थे. इसके अलावा लगभग 40 सालो तक किसी और कार को टैक्सी की परमिट नहीं दी गई. 1974 में टाटा को इटली कंपनी की कार प्रीमियर पद्मिनी भारत में बनाने की इज़ाज़त मिली. लेकिन टाटा को सरकारी खरीद और टैक्सी परमिट से दूर रखा गया. याद रखिये 1980 85 तक कार रखने की हैसियत सबकी नहीं थी, इसलिए कार बाजार का कारोबार सरकारी खरीद या टैक्सी परमिट पर आश्रित था. 1980 के दशक में मारुती कंपनी की कार बाजार में आई लेकिन उसे भी टैक्सी और सरकारी खरीद से बाहर रखा गया.

ambassador car
ambassador car

मारुती के भारतीय बाजार में आने के बाद टाटा की प्रीमियर कार का बड़ा हिस्सा मारुती के पास चली गई, जो संजय गाँधी की सपनो की कार थी. कार बाजार की तरह ही दुपहिया वाहन के क्षेत्र में बजाज के स्कूटर ने लगभग 20 सालो तक एकक्षत्र राज़ किया. हालाँकि उस समय चेकोस्लोवाकिया की बाइक यज़्दी और ब्रिटेन की रॉयल एनफील्ड (बुलेट) को भारत में बेचने की अनुमति जरूर थी. आज़ादी के बाद लगभग 20 साल तक इटली की दो कंपनी वेस्पा और लम्ब्रेटा की दोपहिया वाहन भारत में बिकती रही. 1964 में बजाज ग्रुप को वेस्पा स्कूटर को बजाज के नाम से बेचने की अनुमति मिली और बाजार में उसका रास्ता साफ़ करने के लिए लम्ब्रेटा को सरकार ने ले लिया. दशकों तक बजाज का स्कूटर ब्लैक में बिकता रहा और बजाज ग्रुप पैसे छापता रहा. उस रेंज की बाइक बनाने वाली किसी भी कंपनी को भारत में व्यापर करने की अनुमति मिली. जबकि आजादी के 29 साल बाद तक डीज़ल पेट्रोल केरोसिन तेल की खरीद बिक्री वितरण का पूरा कारोबार बर्माशेल एस्सो कालटेक्स (विदेशी मल्टीनेशनल कम्पनियों) के हाथों में ही था.
bajaj scooter
bajaj scooter

जब अन्य क्षेत्रों में विदेशी कमानियों को व्यापर की इजाजत मिल सकती तो फिर सिर्फ मोटर कंपनियों को (विदेशी) के भारत में प्रवेश पर रोक क्यों लगी रही ? इस रोक की वजह से ही भारतीय कार बाजार पर हिन्दूस्तान मोटर्स और बजाज आटो का एकछत्र एकाधिकार रहा. उस दौर की पुरानी पीढ़ी के बुजुर्गों से पूछिये तो वो बता देंगे कि औद्योगिक घराने बिड़ला और बजाज के रिश्ते कांग्रेस के साथ कितने प्रगाढ़ हुआ करते थे. अगर इन दो कंपनियों की गुणवत्ता के कारन उन्हें यह विशेषाधिकार मिला था तो 1991 उदारीकरण के बाद ये दोनों कंपनियां भारत में क्यों नहीं टिक पाई ? 1991 के उदारीकरण में जब विदेशी कंपनियों के लिए भारत के दरवाजे खुले तो एम्बेस्डर और बजाज दोनों की हालत ख़राब हो गई. तब से लेकर आज तक टाटा के ट्रक को कोई विदेशी कम्पनी का ट्रक चुनौती नहीं दे सका है. बिड़ला और बजाज का उपरोक्त उदाहरण बताता है कि किसी उद्योगपति या औद्योगिक घरानों पर सरकारी कृपा किस तरह बरसाई जाती है.

स्वरा भास्कर का फैक्टचेक : अडानी अम्बानी की एजेंट किसानो को धोखा दे रही है ?

देश में 15-20 साल से मौजूद दर्जन भर देशी विदेशी मोबाइल कम्पनियों ने भारतीय ग्राहकों को खूब लुटा. उस दौर में भी सरकार कंपनी बीएसएनएल को जानभूझकर एडवांस नहीं बनाया गया क्युकी उसका कॉल रेट सबसे सस्ता था. मोबाइल क्रांति आने के बाद 750 रू में 5 जीबी डाटा तथा एक रुपये प्रति मिनट की लोकल कॉल और 2 रुपये प्रति मिनट की एसटीडी व रोमिंग चार्ज के नाम पर लूट जारी रहा. लेकिन जैसे ही मुकेश अंबानी ने मोबाइल क्षेत्र में कदम रखा सबकी बैंड बज गई. कुछ महीनों में ही उसकी जियो मोबाइल देश की सबसे बड़ी मोबाइल कम्पनी बन जाती है, सस्ता डाटा और कॉल देने के बावजूद उसे अरबों रुपये का लाभ होता है क्युकी जनता द्वारा दोनों हाथ फैलाकर किया गया स्वागत होता है. मुकेश अम्बानी पर मोदी से पहले भी कृपा बरसता रहा है. कावेरी गोदावरी बेसिन के केजी-डी 6 ऑयल गैस ब्लॉक के आबंटन का किस्सा आपको चौका देगा.उपरोक्त सच्चाई यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि किसी उद्योगपति या औद्योगिक घराने पर सरकारी कृपा कैसे बरसाई जाती है . अडानी हो अम्बानी, बिरला हो या बजाज बिना सरकारी मेहरबानी के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता.
top-corporate-donor-to-cong-bjp

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1 thought on “अडानी अम्बानी का विरोध : उद्योगपतियों के गुलामी का इतिहास आपकी आंखे खोल देगा !

  1. please keep up. keep up balancing and educating. can you please help me understanding these !
    1. what are the provisions in new agriculture bills that may be harmful to farmers ?
    2. current government could very successfully worked on kashmir reforms and tin tallaq matter. why it failed in agriculture bill ?

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