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तथ्य बिना सत्य नहीं

तांडव मूवी पर बवाल : धार्मिक ही नहीं, देशद्रोह का मामला भी बनता है ?

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तांडव मूवी पर बवाल

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तांडव मूवी पर बवाल : धार्मिक ही नहीं, देशद्रोह का मामला भी बनता है ?

सैफ अली खान अभिनीत तांडव मूवी पर बवाल मचा हुआ है. तांडव के निर्माता ने इस पर माफ़ी मांग ली है, बावजूद इसके तांडव के खिलाफ कई मामले दर्ज हो चुके है. सोशल मीडिया पर लोग मांग कर रहे है की “माफ़ी से काम नहीं चलेगा”. दरअसल यह सिर्फ धार्मिक भावना आहात करने का मामला नहीं है, इसमें देशद्रोह वाली अजेंडे को बढ़ावा देने का पूरा मसाला है. तांडव के निर्माता ने अगर इरादा धार्मिक भावनाओं को आहत करने का नहीं था, तो क्या जब स्क्रिप्ट पास हुई और सीन शूट हुए उस वक्त ख्याल नहीं आया होगा कि भगवान शिव की वेषभूषा में गाली दिलाना कितना सही है ? भगवान शिव की जगह अगर पैगंबर मोहम्मद या ईसा मसीह को रख कर ये सीन शूट करवा सकते है ? दरअसल, पिछले कुछ वक्त से सिनेमा और वेब कंटेंट के जरिए हिंदुत्व और सनातन परंपराओं का मजाक बनाना एक खास एजेंडा बन गया है । असल में ऐसे कंटेंट का मकसद ही युवा पीढ़ी में एक खास विचारधारा के प्रति नफरत पैदा करना और उसके खिलाफ एक ठोस पर्सेप्शन क्रिएट करना होता है।

तांडव मूवी पर बवाल
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यह विरोध क्रिएटिविटी का नहीं बल्कि क्रिएटिविटी के नाम पर सेलेक्टिव सोंच रखने का है. ये सेल्क्टिवे सोंच ही एक धर्म, विचार, और जाती के खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है. दरअसल फिल्म के शुरुआत में भले ही काल्पनिक लिखकर जिम्मेदारी से छुटकारा मिल जाता हो लेकिन लगातार प्रयास युवाओं को बरगलाने में सफल हो जाती है. उनके मन में दीर्घकालिक विंब घर जाते हैं। जिससे आस्था कमजोर होती है और विचार क्षीण होता है। हाल ही में रिलीज़ हुई ‘लैला’ ‘पाताललोक’, ‘सेक्रेड गेम्स’ और आश्रम के जरिए आपके मस्तिष्क में क्या परोसा गया? एक ब्राह्मण अगर शारीरिक संबंध बनाते समय जनेऊ पहले कान पर रखता है । ब्राम्हण की बहु ससुर के साथ हमबिस्तर होती है. ऐसे दृश्य सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि मजबूत सिंबल और पर्सेप्शन बनाते है । एक बाबा (अपराधी) के ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ बोलने पर हिन्दू युवक हसेंगे, लेकिन असल में वो दृश्य अहम ब्रह्मासि के मूल दर्शन को कमजोर करता है।

zeeshan ayub in tandav
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एक दर्शक के तौर पर अगर आप मान रहे हैं कि यह गलती से हुआ है, तो आप दुनिया के सबसे मासूम हैं और एक एजेंडे को चाहे अनचाहे समर्थन ही दे रहे हैं. ऐसे लोगों को बढ़ावा दे रहे है जो कि सीनेमा और वेब कंटेंट के जरिए अपने अजेंडे को बढ़ा रहे है. तांडव हो scared Games ऐसी कंटेंट सीधे तौर पर एक विचार और एक जीवन पद्धति को चोट पहुंचती है. तांडव के निर्माता और लेखकों पर देशद्रोह का केस होना चाहिए. इसके कंटेंट पूरी तरह से वामपंथी विचारधारा को प्रोत्साहन देने से ज्यादा दलितों और मुसलमानो के मन में भारत सरकार के खिलाफ ज़हर फ़ैलाने का काम करते है. एक इसके एक एपिसोड में मुसलमान पात्र कहता है की “हमे मरना आसान है, तो इनसीटूशन (संस्थाएं) क्या है”? इसकी गंभीरता को समझिये. पिछले 5 सालो में वन्दे मातरम का विरोध खुल कर एक समुदाय (कुछ चंद लोग) करते आये है, इस सीरीज में ऐसी घटनाओ का महिमामंडन किया गया है.

कब कौन सी फिल्म के सीन हटाए गए ?
तांडव में एक दूसरे लेखक उदय प्रकाश की कहानी ‘पिली छतरी वाली लड़की’ से चुराकर इसमें डाला गया है. JNU के प्रोफेशर्स की छवि ख़राब करने की कोशिश भी है. जिसके लिए निर्माताओं के ऊपर मानहानि का केस हो सकता है. फिल्म विश्वरूपम के समय देश में कांग्रेस की सरकार थी, उस समय एक समुदाय विशेष ने इतना बवाल किया की उसके कुछ हटाने पड़े थे. आज जो लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी का मामला बताकर इसका समर्थन कर रहे है उहने जवाब देना चाहिए. उनको ये भी बताना चाहिए की नाना पाटेकर की फिल्म ‘मुस्तफा’ के एक गाने की एक लाइन को लेकर इतना बवाल और प्रदर्शन हुआ की उन शब्दों को गाने से हटाना पड़ा. जब एक धर्म के खिलाफ कोई अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं हो सकती तो दूसरे धर्म के खिलाफ क्यों ?
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