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तथ्य बिना सत्य नहीं

नैया डूबेगी या पार लगेगी ?

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राजनीति की बिसात पर नीतीश कुमार अकेले पड़ते जा रहे हैं…. एक तरफ उनके विश्वस्तों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, तो दूसरी तरफ उनके उनके सभी विरोधी मजबूत बनकर उभर रहे हैं। आने वाले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के सामने कई ऐसी चुनौतियां आने वाली है जिसका सामने उनके लिए आसान नहीं है।

चुनौती नंबर १.
पार्टी में बगावत

ललन सिंह ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है….ललन सिंह का कहना है कि पार्टी में उनकी सूनने वाला कोई नहीं है….और जब प्रदेश अध्यक्ष की कोई नहीं सुनता तो इस पद पर बने रहना का कोई औचित्य नहीं रह जाता… जेडीयू में ललन सिंह अकेले ऐसे नेता नहीं है जो नीतीश कुमार की तानाशाही से परेशान हो… प्रभुनाथ सिंह…. शिवानंद तिवारी ऐसे दर्जन भर नाम हैं जो कभी भी पार्टी छोड़ सकते हैं।

चुनौती नंबर २
राहुल का मिशन बिहार

कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी भी नीतीश कुमार के लिए मुश्किलें खड़ा करते नजर आ रहे हैं… राहूल के आने से जिस तरह यूपी कांग्रेस मय हो गया… उसी तरह उनके बिहार दौरे से प्रदेश भी पंजे के शिकंजे में चला जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा।
लालू-पासवान की बढ़ती ताकत और राहुल के “मिशन बिहार” से राजनीति गरमाई कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के “मिशन बिहार” से सियासत गरमा गई है। बिहार में लगभग 10 महीने में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राहुल गांधी के दौरे को काफी अहम माना जा रहा है। राहुल का दौरा उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में भी कांग्रेस में जान फूंक सकता है। शायद यही वजह है कि राहुल के दौरे से जहां कांग्रेस में उत्साह है, वहीं दूसरे राजनीतिक दलों में हड़कम्प मच गया है।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तानाशाह की तरह व्यवहार करने का आरोप लगाते हुए जदयू के प्रदेश अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने अपने पद से इस्तीफा देने की पेशकश की है।
ललन सिंह ने नीतीश पर निर्णयों में विचार-विमर्श नहीं करने का आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी के निर्णयों के बारे में उन्हें जानकारी अखबारों के माध्यम से मिलती है। ऐसे में उनकी जगह किसी अन्य व्यक्ति को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर लिया जाए।
मुंगेर संसदीय क्षेत्र से जदयू सांसद ललन सिंह ने बताया कि उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव से उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से मुक्त करने का अनुरोध किया है।
ललन ने कहा कि पार्टी को खडा़ करने में उनका योगदान किसी अन्य नेता से कम नहीं है। ललन ने जदयू में उपेंद्र कुशवाहा को दोबारा शामिल किए जाने पर एतराज जताते हुए कहा कि उस समय नीतीश कहां थे जब कुशवाहा ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा था।
चुनौती नं. 3- लालु यादव ने 28 जनवरी को बिहार बंद को सफल बनाकर यह जता दिया हैं कि इस बार शुसाशन बाबू की राह आसान नहीं हैं, उनके सहयोगी लोजपा. सुप्रिमो भी कोइ कसर नहीं छोड़ेंगे । लोकसभा चुनाव ने जिस तरह चौकाने वाला रिजल्ट दिया था, इस बार ऐसा नहीं होगा इस बात की गारंटी कोइ नहीं दे सकता । लालू-पासवान पिछली बार की तरह कोइ गलती नहीं करेंगे, इसलिए अभी से हीं चुनाव की तैयारी मे लग गये है ।
तस्वीर बिल्कुल धुंधली हैं और हो सकता हैं चुनाव परिणाम के दिन तक धुंधली ही रहें । ऐसे हालात में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह ‘राह नहीं आसान’ और कहना मुश्किल हैं कि “नैया डूबेगी या पार लगेगी”

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