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बलवंतराय मेहता की कहानी : एक मुख्यमंत्री जो भारत पाक युद्ध में शहीद हो गया !

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बलवंतराय मेहता की कहानी

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बलवंतराय मेहता की कहानी : एक मुख्यमंत्री जो भारत पाक युद्ध में शहीद हो गया !

भारत पाक युद्ध में शहीद हुए बलवंतराय मेहता की कहानी काफी दिलचस्प है. अक्सर दो देशों की लड़ाई में सैनिको के शहीद होने की बात की जाती है. लेकिन आज भी युद्ध के दौरान सैनिको के शहादत के अलावे कई लोग प्रभावित होते है. ये कहानी है एक ऐसे मुख्यमंत्री की जिसका परिवार भारत पाक युद्ध का शिकार बन गया. आज़ादी के बाद बलवंतराय ने गांधीजी के कहने पर कांग्रेस की सदस्यस्ता ली थी. गाँधी जी ने जिस स्वराज्य का सपना देखा था बलवंत मेहता को उसका जनक कहा जाता है. आज़ाद भारत के इतिहास में शहीद होने वाले पहले मुख्यमंत्री थे बलवंत राय मेहता.

बलवंतराय मेहता की कहानी
बलवंतराय मेहता की कहानी

कांग्रेस कार्यकारिणी ज्वाइन करने के बाद 1952 में देश में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर भावनगर (गुजरात) से चुनाव जीते. उसके बाद 1957 में दूसरी बार भावनगर से चुनाव लड़े तब उनके सामने प्रजा सोसलिस्ट पार्टी के प्रत्यासी जशवंत भाई मेहता थे. इस चुनाव में भी जीत गए. 1957 चुनाव के बाद सामुदायिक विकास (स्वराज्य) कार्यक्रम के लिए समिति बनाई गई जिसके अध्यक्ष बने बलवंत राय मेहता. मेहता ने तीन स्तर वाले पंचायती राज का पूरा खाका तैयार किया जिसे अप्रैल 1958 में लागु किया गया. इसकी शुरुआत भले ही पंडित नेहरू ने राजस्थान से किया लेकिन पूरी तरह लागु करने वाला राज्य आंध्र प्रदेश बना.

कांग्रेस के कामराज प्लान के बारे में आप जानते होंगे जो अगस्त 1963 में आया था. इसके तहत पहली बलि कद्दावर कांग्रेसी नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्ता की ली गई. चन्द्रभानु नेहरू विरोधी खेमे से आते थे इसलिए उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा. उस समय गुजरात में जीवराज मेहता मुख्यमंत्री थे जो नेहरू के काफी करीब थे. मोरारजी देसाई के लाख मना करने के बाद भी जब चन्द्रभानु गुप्ता से इस्तीफा ले लिया गया तब उन्होंने गुजरात में जीवराज मेहता का विरोध किया. चुकी गुजरात मोरारजी का गढ़ था, इसलिए नेहरू को यहाँ झुकना पड़ा कर जीवराज मेहता को CM पद से हटाना पड़ा. उसके बाद सितम्बर 1963 में बलवंत राय मेहता गुजरात के मुख्यमंत्री बने. हालाँकि जीवराज से पहले मोरारजी ने बलवंत राय का नाम सुझाया था लेकिन तब नेहरू ने उनकी मांग को दरकिनार कर दिया था.

राजनीती में आने से पहले बलवंत मेहता आज़ादी के आंदोलन में शामिल थे. उन्होंने जलीलयावल बाग़ गोलीकांड के बाद पढाई छोड़ दिया और पूरी तरह आंदोलन में शामिल हो गए. दरअसल जब हत्याकांड की खबर एक दिन बाद अख़बार के माध्यम से गुजरात पहुंची तब 20 वर्षीय बलवंत ने आज़ादी की ज़िद पाल ली. अगले साल ग्रेजुएशन तो पूरा किया लेकिन अंग्रेजी हुकूमत से सेर्टिफिकेट लेने से इंकार कर दिया. कॉलेज से निकलने के उन्होंने लाला लाजपतराय के संगठन ‘सर्वेंट ऑफ़ पीपल’ को ज्वाइन कर लिया. यह एक गैर राजनीतिक संगठन था.बलवंतराय मेहता दो बार इस संगठन के अध्यक्ष भी चुने गए. पहली बार उन्होंने 1921 में उन्होंने भावनगर प्रजामंडल की स्थापना की. तब भावनगर एक राजवाड़ा था, जिस पर अंग्रेजों का सीधा कब्ज़ा नहीं था लेकिन उनके इशारे पर ही वहां के राजा कृष्णाकुमार सिंह काम करते थे.

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1965 में जब भारत पाकिस्तान का युद्ध शुरू हुआ तब बलवंत राय गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 19 सितम्बर 1965 को उनकी शहादत हुई. दरअसल युद्ध की वजह से गुजरात में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा था. इस तनाव को कम करने के लिए उन्होंने द्वारका के मीठापुर में रैली करने का फैसला किया. उनके सहयोगियों ने युद्ध के समय भारत पाक सीमा पर विमान यात्रा ना करने की सलाह दी. अहमदाबाद से द्वारका की दुरी लगभग 440 किलोमीटर थी जबकि कराची सिर्फ 350 किलोमीटर. दोपहर को बलवंत राय मेहता अपनी पत्नी और कुछ अधिकायर्यों समेत अहमदाबाद हवाई अड्डे से द्वारका के लिए निकले. दूसरी तरफ कराची (पाकिस्तान) के मेरीपुर एयरबेस से एक फाइटर प्लेन ने उड़न भड़ी. फ्लाइंग अफसर कैस मजहर हुसैन को भुज की सीमा पर भारतीय उड़ानों पर नज़र रखने के लिए भेजा गया था.

पाकिस्तानी पायलट ने भुज की तरफ जाते बलवंत मेहता के प्लेन को देखा. उसने मिथली गांव के ऊपर उड़ रहे जहाज को करीब से देखा तो फायरिंग नहीं की. उसने पहचान लिया के ये एक सिविलियन जहाज है. तब पायलट ने कण्ट्रोल रूम में मेसेज भेजा “इस पर विक्टर टैंगो लिखा हुआ है. ये आठ सीटर जहाज़ है. बताइए इसका क्या करना है?” थोड़ी देर इंतज़ार करने बाद कण्ट्रोल रूम ने जहाज को उड़ा देने का आदेश दिया. कण्ट्रोल रूम के मेसेज से पायलट दुविधा में था, क्युकी उसने साफ़ साफ़ देखा था की यह सेना का नहीं बल्कि 8 सीटर सिविलियन विमान जहाज था. लेकिन पाकिस्तानियों को शक था की सीम रेखा के इतने नजदीक से उड़ रहा है तो कहीं वो तस्वीरें तो नहीं ले रहा ? पायलट ने ना चाहते हुए भी अपने सुपीरियर के आदेश का पालन करते हुए मेहता के विमान पर फायरिंग शुरू कर दी. लगातार हमले के बाद वो जहाज आग के गोले में तब्दील हो गया. इस जहाज में मेहता के अलावे उनकी पत्नी सरोजबेन मेहता, उनके तीन सहयोगी और ‘गुजरात सामाचार’ के एक संवाददाता सवार थे. हमले में सब लोग मारे गए.

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