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तथ्य बिना सत्य नहीं

बिहार नरसंहार का इतिहास : लिहाज करने वाले अचानक हिंसक क्यों हो गए ?

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बिहार नरसंहार का इतिहास

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बिहार नरसंहार का इतिहास : सम्मान और लिहाज करने वाले अचानक हिंसक क्यों हो गईं ?

बिहार नरसंहार का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. बारा और सेनारी जैसे नरसंहार हमें आंसु बहाने की बजाय यह सोचने को विवश करते हैं कि सम्मान और लिहाज करने वाली जातियाँ अचानक हमारे विरुद्ध इतनी हिंसक क्यों हो गईं ।हमने प्रतिकार स्वरूप बथानीटोला और अन्य अनेक बस्तियों में दलितों का नरसंहार किया ,लेकिन इस घात -प्रतिघात का सिलसिला मियांपुर नरसंहार के बाद ही क्यों रुक पाया था ।आश्चर्यजनक था कि मियांपुर में दलित नहीं यादव मारे गये थे ।भूमिहारों ने अनुमान लगाया कि भूमिहार बस्तियों में नरसंहार दलित नहीं यादव और मुसलमानों की ही जोड़ी कर रही थी ।

बिहार नरसंहार का इतिहास
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यादवों और भूमिहारों के बीच संघर्ष का आरम्भ तो डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह के ही समय शुरू हो गया था ।सुनते हैं कि यादवों को जब बाबू रामलखन सिंह यादव या अन्य स्रोतों से यह जानकारी हुई कि वे क्षत्रिय हैं और उन्हें भी जनेऊ पहनने का अधिकार है ,तब ब्राह्मणों ने उनके इस ज्ञान का स्वागत कर उन्हें उपनयन से संस्कारित करना शुरू किया । भूमिहारों को जब मालूम हुआ ,तब वे आगबबूला हो गये ।ब्राह्मणों ने उन्हें समझा दिया था कि यादव यदि क्षत्रिय हैं ,तो क्या हुआ ,आप भी तो क्षत्रियों का विनाश करने वाले परशुराम के वंशज हैं ।

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आपको परशुराम का स्मरण कर युद्ध -नाद करना चाहिए ।फिर क्या था ,चूहर चक के मथुरा सिंह ,मानो -रामपुर के प्रसिद्ध सिंह ,खुटहा के गया सिंह आदि ने क्षत्रिय संहार का बिगुल बजा दिया ।मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह को अहसास हो गया कि बिहार की राजनीति की धुरी हत्या -रक्तपात की ओर मुड़ती जा रही है ।वे यथासंभव इस परिवर्त्तन को रोकने का प्रयास करते रहे थे ,लेकिन भूमिहार खेमा उनकी बातों को महत्त्व नहीं दे रहा था ।समय बदला ।श्री बाबू की मृत्यु हो गयी और बिहार की राजनीति में भूकम्प आ गया ।बिहार की मिनिस्ट्री छह छह महीने में बदलने लगी थी ।फिर , वह सब प्रतिफलित हुआ जिसके लिए सारा चक्रव्यूह रचा गया था ।विनोदानंद झा ,के बी सहाय ,महामाया बाबू ,जगन्नाथ मिश्र ,केदार पांडे ,भागवत झा आजाद आदि मुकुट पहनने में कामयाब हुए ।चंद्रशेखर सिंह और सत्येंद्र सिंह के भी नाम आये ,पर वे दुदिनमा सिद्ध हुए ।

अंततः विविध चक्रवातों को पार करते हुए बिहार की राजनीति लालू युग में प्रवेश कर गयी ।यादवों को लगा कि डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह के समय शुरू हुए युद्ध में यह फैसला नहीं हो सका था कि यादव और भूमिहार में ज्यादा ताकतवर कौन है ,यह कि अब लालू जी की सरपरस्ती में युद्ध का उपसंहार हो जाना चाहिए ।मंडल की राजनीति ने भूमिहारों को पूर्णतः अलग -थलग कर दिया था ,जिससे इस युद्ध को जीतना आसान लगने लगा था ।शायद अपने नेतृत्त्व से प्रेरित होकर ही यादवों ने इसे नक्सल आंदोलन का नाम दिया था । Part 1 continue……
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