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तथ्य बिना सत्य नहीं

मजदूरों को पलायन के लिए किसने मजबूर किया ?

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worker family migrant

worker family migrant on highway

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मजदूरों को पलायन के लिए किसने मजबूर किया ?
2014 के बाद से मीडिया के लिए एक नया शब्द गढ़ा गया “गोदी मीडिया” जिसका मतलब है देश की तमाम मीडिया मोदी के गोद में बैठा है. धीरे धीरे आम जनमानस के मन में इस बात को बिठा दिया गया. शायद बीजेपी और खुद मोदी भी इसे ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करते हुए निश्चिन्त हो गए. यकीन ना हो तो मोदी के कार्यकाल में सुचना प्रसारण मंत्रालय और उसके मंत्री का काम देख लीजिए. ये लोग शायद भूल गए मीडिया किसी का नहीं होता उसे जहाँ से फण्ड मिलता उसी की तरफदारी करता है. एक या दो मीडिया मालिकों से सेटिंग (शायद) के बावजूद पिछले 6 साल का कवरेज उठाकर देखिये तो मीडिया में मुद्दा वही बना जो विपक्ष ने चाहा. जिससे साफ़ हो जाता है की मोदी इस मंत्रालय को मैनेज करने में नाकाम रहे है, जबकि विपक्ष आज भी मीडिया के मामले उतना ही ताक़तवर है जितना वो सत्ता में रहते होता था. गुजरात का एक अख़बार 2016 के बांग्लादेशी महिला के बच्चे के साथ फर्जी फोटो के आधार पर खबर छाप देता और उसके ऊपर कोई करवाई नहीं होती. इसी प्रकार भास्कर एक बच्ची को पैसे का लालच देकर पहले खुद गेंहू के दाने जमीं पर बिखेरता है और फोटो खींचकर अगले दिन मुख्यपृष्ठ पर इस हेडिंग के साथ कि जमीन पर पड़ा गेंहूँ का एक एक दाना बीनती बच्ची,शायद इससे उसके भाइयो की भूख मिट सके। हकीकत भी सामने आया लेकिन भास्कर पर कार्यवाही क्या हुई ?ऐसी सैकड़ो खबरों रोज सामने आती है लेकिन किसी पर कार्यवाई नहीं होती लेकिन एक संपादक अगर कांग्रेस अध्यक्षा के असली नाम से पुकार लेता है तो उसके ऊपर सैकड़ों मुकदमे हो जाते है. मजदूरों को पलायन के लिए किसने मजबूर किया ?

child migrant on flyover
child baby migrant on flyover

मजदूरों को पलायन के लिए किसने मजबूर किया ? मजदूरों के पलायन में इस विभाग का सबसे अहम् किरदार रहा है. वो कैसे समझिये कुछ उदाहरण के साथ. पिछले कई दिनों से “करोड़ो मजदूर” शब्द मीडिया छाया है. सीधा सीधा झूठ सरकार के प्रवक्ताओं के सामने बोला जाता है. न्यूजचैनलों के एंकर पूरी ताकत से राग अलाप रहे हैं कि करोड़ों प्रवासी मजदूर सड़कों पर चल पड़ा है. आप स्वयं तय करिए कि सच क्या है. 5 नहीं अगर 50000 ट्रको में भी मजदूरों को एक से दूसरे प्रदेश में भेजा जाए तब भी यह संख्या 20 लाख से अधिक नहीं होती, जबकि हक़ीक़त ये है की ये संख्या और भी कम है. पिछले 15 दिनों में सरकार 1000 से ज्यादा ट्रेनों के माध्यम से लगभग 12 लाख मजदूरों को उनके गंतव्य तक पंहुचा चुकी है. निश्चित रूप से पहली गलती केंद्र सरकार की है जिसने इस उम्मीद के साथ शार्ट नोटिस पर लॉक डाउन का ऐलान किया की तमाम राज्य सरकारें उनका सहयोग करेंगी. शायद मोदी यह भूल गए देश के कुछ राज्यों में अब विपक्ष की सरकार भी है जो हर कीमत पर उनको नाकामयाब करने की कोशिश करेंगी. इसलिए इस ऐलान से पहले कम से कम 2 दिन का समय मजदूरों को देना चाहिए था.एक भी भारतीय नागरिक को तकलीफ हो तो उसकी सीधे जवाबदेही सरकार की होती है और उससे सवाल करना ही चाहिए. उनकी एक बात से सहमत हुआ जा सकता है की लॉक डाउन केंद्र सरकार ने लगाया इसलिए सवाल मोदी से बनता है. लेकिन ये सवाल तो राज्य सरकरों से भी पूछा जाना चाहिए की अगर वो दावा कर रही है प्रवासियों के समुचित व्यवस्था की फिर ये क्यों जा रहे है ?मजदूरों को पलायन के लिए किसने मजबूर किया ?
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मजदूरों को पलायन के लिए किसने मजबूर किया ? आपने कितने टीवी और अख़बार वालों को देखा दिल्ली के मुख्यमंत्री से सवाल करते हुए जहाँ से पलायन का सिलसिला शुरू हुआ. किसी ने केजरीवाल से नहीं पूछा की जब 2500 रसोई में 4 लाख (रोज) लोगों के लिए खाना बन रहा है फिर जाते हुए मजदूर ये खाना पानी ना मिलने का आरोप क्यों लगा रहे है ? विपक्ष और मीडिया का पूरा ध्यान सिर्फ यूपी में आने वाले मजदूरों और दुर्घटनाओं पर है, लेकिन इन मजदूरों को जहां से भगाया जा रहा है महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, पंजाब उन राज्यों पर कहीं कोई खबर क्यों नही ?मजदूरों के मामले सबसे फिसड्डी राजस्थान की गेहलोत सरकार साबित हुई लेकिन कहीं कोई खबर नहीं ? एक टीवी चैनल राजस्थान के कई शहरों से लाइव कवरेज करके दिखाया की सरकार के दावों के उलट कहीं बसों की व्यवस्था नहीं है, सड़क पर चलने वालों प्रवासियों को कोई रोकने टोकने या पूछने वाला नहीं है. एक अन्य टीवी चैनल ने महाराष्ट्र की भयानक तस्वीर तो दिखाई लेकिन उस खबर को भी दबा दिया गया. उस चैनल ने अपने 4 मिनट के वीडियो में दिखाया की सैकड़ों की संख्या में ट्रक नासिक- भिवंडी हाइवे पर महाराष्ट्र पुलिस की देखरेख में बिहार और झारखण्ड की मजदूरों को भर रहे है. उन मजदूरों 3-4 हज़ार रूपये प्रति सवारी भी वसूला जा रहा था. यह सब चोरी छिपे नहीं बल्कि बल्कि पुलिस की देखरेख में हो रहा था.खुद ट्रक ड्राइवर रिपोर्टर को बता रहे है पुलिस बहुत सहयोग कर रही है. हालाँकि इसके लिए सीधे सीधे पुलिस को दोष नहीं जाना चाहिए. रेडजोन घोषित इलाके में लागू लॉकडाउन की धज्जियां उड़ा कर हाइवे पर सरेआम सैकड़ों ट्रकों की कतार लगवा के अवैध रूप से सवारी भरवाने की हिम्मत कोई सिपाही दरोगा या इंस्पेक्टर तब तक कर ही नहीं सकता, जब तक उसे ऊपर से ऐसा करने का आदेश खुली छूट ना दे दी गयी हो. आज यही मजदूर बिहार और झारखण्ड में पहुंच कर कोरोना का कोहराम मचा रहे है.ऐसा नहीं है की जितने लोग सड़कों पर दिख रहे है वो सिर्फ खाने पिने की कमी की वजह से वापस जा रहे है, उनमे से कइयों के कुछ और भी मजबूरियां है. कई लोग तो ऐसे भी है जो टीवी वालों के दम पर निकल गए की सड़क पर निकलने पर पुलिस कोई न कोई इंतेज़ाम कर ही देगी क्युकी कैमरे वाले सड़क पर मिल जाएंगे. इन मजबूरों के साथ कुछ ऐसे भी है जिन्होंने फ्री में घर चले जाने का रास्ता निकल लिया क्यकि उन्हें पता चल गया है यूपी में घुस जाने के बाद सरकार खुद घर तक पंहुचा रही है. इसलिए ऐसा नहीं की सड़क पर चलने वाला हर सख्श मजबूर है.

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