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तथ्य बिना सत्य नहीं

लचित बोरफुकन गुमनाम योद्धा : असम के शिवाजी, मुग़ल सल्तनल के संहारक !

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लचित बोरफुकन गुमनाम योद्धा

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लचित बोरफुकन गुमनाम योद्धा : जिससे मुग़ल सल्तनत भी पानी मांगता था !

लचित बोरफुकन गुमनाम योद्धा थे. जिन्हे इतिहासकारों ने किताबों से गायब कर दिया. मुग़लों के महिमांडन के अलावा देश कई ऐसे योद्धाओं को एक क्षेत्रीय दायरे में समेट दिया गया. जिनकी वीरगाथा दुनिया के लिए प्रेरणा है ऐसे वीरों की कई कहानिया है जिन्हे महत्त्व नहीं मिला. लचित बरफुकन उन्ही में से एक है. असम में आज भी उनके किस्से मशहूर है. जिनके जीते जी मुग़ल सल्तनत असम में अपने पांव तक नहीं जमा पाई. भारतीय इतिहास की किताबों को पढ़ें तो लगता है कि मुगलों से बड़ा ना तो कोई राजा था और ना ही योद्धा। लेकिन यह मिथक जानबूझकर गढ़ा गया है।

राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में लचित बरफुकन के नाम से बेस्ट कैडेट गोल्ड मेडल भी दिया जाता है, जिसे “लचित मेडल” कहा जाता है। छत्रपति शिवाजी की तरह कई स्वतंत्रता सेनानियों ने मुग़लों की पूरी फौज बर्बाद कर दी थी। लचित बरफुकन उन्ही में एक थे जिनका जन्मदिन पर आज भी नवंबर को मनाया जाता है.

लचित बोरफुकन गुमनाम योद्धा
लचित बोरफुकन गुमनाम योद्धा

लचित की गैरहाजिरी में साल १६६२ में मुगलों ने आहोम साम्राज्य की राजधानी गुवाहाटी पर कब्जा कर लिया था। उन्होंने तत्कालीन आहोम सम्राट जयध्वज को अपमानजनक शर्तें मानने के लिए विवश कर दिया। उनकी भतीजी और बेटी को मुगल हरम का हिस्सा बना दिया गया। जिसके खिलाफ पूरे असम में क्रोध की लहर दौड़ गई। पांच ही सालों में मुगलों को असम से बाहर भगा दिया गया। लेकिन औरंगजेब ने प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न असम को जीतने के लिए फिर से एक विशाल सेना भेजी जिसमें ३०,००० पैदल सैनिक, १५,००० तीरंदाज, १८,००० घुड़सवार, ५००० बंदूकची और १००० से अधिक तोपों के अलावा युद्धपोतों का एक विशाल बेड़ा था। इस सेना का मुकाबला करने के लिए सेनापति लचित ने कमान संभाली। उन्होंने छापामार युद्ध की रणनीति अपनाई। १६६९-७० के बीच मुगल सेना और आहोम सैनिकों के बीच कई झड़पें हुईं। जिसका कोई परिणाम नहीं निकला। इसके बाद सन् १६७१ का साल आया, जब निर्णायक युद्ध हुआ। जिसे सराईघाटी के युद्ध के नाम पर जाना जाता है।

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ये असम का इतिहास तय करने वाली रात थी। मुगल असम की सीमा से कुछ दूर थे। मुगलों और असम के सैनिकों के बीच युद्ध चरम पर था। इस रात असम का ऐसा शूरवीर तैयार हो रहा था जिसकी पहचान युगों-युग के लिए असम के इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाली थी। इस रात मुगलों की हार होनी थी। इस रात असम और मुगल दोनों का नसीब तय होना था। ये वो कहानी है जो असम के बच्चे-बच्चे को मुंह ज़ुबानी याद है। वो कहानी जो हर पीढ़ी को जिंदगी में रोज की मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत देती है। ये एक निर्णायक लड़ाई थी, लेकिन इससे पहले ही वीर लचित बीमार पड़ गया। वो फिर भी डटा रहा अपने राजा चक्रध्वज सिंह से मिले उस कर्तव्य के लिए, जो उनके पिता जयध्वज सिंह ने उन्हें दिया था। राजा जयध्वज ने बेटे को अपने देश के खोये सम्मान को वापस हासिल करने का काम दिया था। लचित ने ब्रम्हपुत्र नदी पर मिट्टी से तटबंधों का निर्माण करने का आदेश दिया।

लचित को अपने मामा पर बहुत गुस्सा आया। जो अपने सैनिकों को काम करने के लिए उत्साहित भी नही कर पाये। जिसकी वजह से देरी तो हुई ही, इसके साथ ही लचित की बनाई रणनीति पर भी संकट आ गया। उसने अपनी वो सोने की तलवार निकाली, जिसे आहोम का राजा अपने सेनापति को देता है और उससे अपने मामा का सिर धड़ से अलग कर दिया। लचित ने इसे एक रात में बनवाने का जिम्मा अपने मामा मोमाई तामुली को दिया था। लोगों के बार-बार कहने के बावजूद लचित ने आराम करने से मना कर दिया। लचित काम कँहा तक पहुँचा ये देखने के लिए निर्माण वाली जगह पर गया। लेकिन जब वो वँहा पहुँचा तो उसने देखा, सारे सैनिक हताश खड़े हैं। सैनिकों ने मान लिया था कि वो चाहें जो कर लें, लेकिन सूर्योदय होने से पहले तटबंध नहीं बना पायेंगे। उन्होंने युद्ध शुरू होने से पहले ही हार मान ली थी।

लचित ने अपने सैनिकों से कहा, “जब मेरे देश पर आक्रमणकारियों का खतरा बना हुआ है, जब मेरे सैनिक उनसे लड़ते हुए अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा रहे हैं, तब मैं महज बीमार होने के कारण कैसे अपने शरीर को आराम देने की सोच सकता हूँ। मैं कैसे सोच सकता हूँ अपने बीवी और बच्चों के पास घर वापस चले जाने के बारे में, जबकि मेरा पूरा देश खतरे में है।”लचित ने कहा, “मेरा मामा मेरे देश से बड़ा नही है।” लचित के ऐसा करने से सैनिकों में एक जोश भर गया। सूरज उगने से पहले ही तटबंध बनकर तैयार हो गये। वीर ने भूमि के साथ-साथ ब्रह्मपुत्र नदी पर भी अपनी जीत सुनिश्चित कर ली थी। लाचित ने सिर्फ ७ छोटी नौकाओं में भरे अपने सैनिकों के साथ मुगलों की विशाल फौज पर हमला किया। जिसके बाद उनकी पूरी फौज बिखर गई। ४००० मुगल सैनिक मार डाले गये। उनकी नावें और भारी तोपें ब्रह्मपुत्र में डुबा दी गईं, जहाज नष्ट कर दिए गये। विशाल मुगल फौज तितर बितर हो गई। इस भीषण पराजय का नतीजा ये रहा कि मुगलों की कभी हिम्मत नहीं पड़ी कि वह पूर्वोत्तर की तरफ अपनी गंदी निगाहें डाल पायें। कुछ इतिहासवेत्ता ऐसा कहते हैं कि लचित ने तटबंधों का निर्माण कुछ इस तरह से करवाया था कि जिससे ब्रम्हपुत्र नदी की वेगवती धारा को मोड़ा जा सके। जिसके फेर में आते ही मुगलों की की जल-सेना ब्रम्हपुत्र के बहाव में ही फस कर रह गई थी।
Lachit_Borphukan

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